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वे सोचते हैं कि किसी विशेष परिस्थिति में प्रेम का व्यवहार इसलिए प्रदर्शित नहीं हो पाया कि फलां मजबूरी थी।
भ्रम पालने वाले वास्तविकता से मुंह चुराते रहते हैं कि कहीं इसे स्वीकार कर यह प्यारा खेल समाप्त न हो जाए। दरअसल, प्रेम का भ्रम नए सिरे से पालने में भी बड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। सही पात्र खोजना, उससे न्यूनतम मर्यादा की अपेक्षा करना भी कोई आसान काम नहीं होता है।
सच तो यह है कि भ्रम में उलझे रहने वाले प्रेम में भी कुछ अंश कभी न कभी सच्चे प्रेम का भी रहता है। चाहे वह सच्चा अहसास पल भर का ही क्यों न हो पर वही भावना निर्जीव अहसास को सजीव करती रहती है। वैसे तिनके का फिर सहारा खोजना भी बहुत मुश्किल होता है। इसीलिए उसी भ्रम को बनाए रखने के लिए मनुष्य हर मुमकिन प्रयास करता है।
ऐसे ही भ्रम के टूटने से घबराई हुई है प्रिया (बदला हुआ नाम)। प्रिया, पिछले चार वर्षों से राघव (बदला हुआ नाम) से सच्चे मन से प्यार करती है। पर उसे धीरे-धीरे यह अहसास हो गया कि राघव को उससे प्यार नहीं है। हालांकि प्रिया को इस रिश्ते की सच्चाई बहुत पहले समझ में आने लगी थी पर वह उस भ्रम में जीने में ही खुशी महसूस कर रही थी।
वह सोचती थी चलो सौ न सही 5 प्रतिशत या 2 प्रतिशत तो प्रेम की भावना भी होगी पर धीरे-धीरे उसकी वह डोर भी हाथ से छूटती नजर आती है। इस सच्चाई का सामना करने से वह घबरा रही है।
प्रिया, आप इस रिश्ते की सच्चाई लंबे समय से जान रही हैं पर आप अपना भ्रम पालने के लिए कोई न कोई कोण अवश्य तलाश लेती थीं ताकि इस रिश्ते को लेकर जो आपकी समझ थी वह झूठी साबित न हो। यह एक विचित्र फितरत है कि हर मनुष्य अपनी आस्था, अपने विचार, अपने रिश्ते, अपनी सोच व समझ को सही मानकर बचाने के लिए आखिरी दम तक कोशिश करता है। उसे सबसे ज्यादा कष्ट अपनी आस्था के गलत साबित होने की वजह से होता है।
प्रिया आपको भी सबसे ज्यादा बुरा यह लग रहा है कि आखिर जिसे आपने सही माना वह गलत क्यों कर निकला। जिसकी हर बात पर आप आंखें मूंदकर विश्वास करना चाहती थीं वह इतना बड़ा फरेबी क्यों कर साबित हुआ। प्रेम चाहे अपने बच्चे से हो या परिवार के किसी सदस्य से हो या फिर दोस्त से हो, उसमें एक मासूमियत का पक्ष तो अवश्य शामिल होता है और, उस मासूम अहसास को जब चोट पहुंचती है तो मन सबसे ज्यादा आहत होता है।
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आपको लगता है, काश जिसे प्रेम किया वह इतना साहसी होता कि आपको अपनी सही भावना से अवगत कराता। कम से कम एक अच्छे दोस्त की तरह सच्चाई का सामना करना सिखाता। पर, इसके बजाय उसने तरह-तरह के भ्रम पैदा किए।
प्रिया जी, जब जागो तभी सवेरा। कोई बात नहीं प्रेम का भ्रम ही सही उसका भी अपना सुख है। चलिए उतने दिन आपने वही सुख जीया वह भी कम नहीं है। यही सोचकर माफ कर दीजिए कि उसकी वही फितरत रही होगी या फिर कोई मजबूरी जिसे उसने कभी पूरे मन से आपके सामने नहीं रखा।
गलती उससे भी हुई है और आपसे भी। आपने भी तो उसे आंखें मूंदकर चाहा। आप दोनों का दोष बराबर है। उसे भी माफ कीजिए और खुद को भी। धीरे-धीरे स्थिति सामान्य हो जाएगी।
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