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NDलगभग यही बात आमिर ने अपनी फिल्म 'थ्री इडियट्स' में कही है। सबसे पहले तो यह तय करें कि आपको क्या करना बहुत अच्छा लगता है, फिर वह काम करते हुए आप पूरी तरह से ऑनेस्ट रहें, डूबकर काम करें... वैसे वो तो स्वतः ही होगा, क्योंकि वो आपकी रुचि का काम जो है। फिर उससे सीखा भी जा सकता है, लेकिन जब आप कोई काम अरुचि और दबाव में करेंगे तो फिर उसका न तो आनंद ले सकेंगे और न ही उससे कुछ सीख सकते हैं, सफलता पाना तो और भी मुश्किल का मैदान है।
तो कुल मिलाकर मामला वही है कि आप वह करो जिसे हकीकत में करना चाहते हो, बाकी चीजों के बारे में चिंता मत करो। वह आखिरकार स्थापित होगा ही। इस बात की भी चिंता मत करो कि आपको कितनी सफलता मिली है, चिंता इस बात की करो कि आपने जो किया या जो कर रहे हैं, उससे आपने सीखा क्या, याद क्या रखा...? पाया क्या... मटिरियलिस्टिक पाना, एक्चुअल में पाना नहीं है...।
क्या आपने ऐसे लोगों को देखा है जिनके पास डिग्री कोई और होती है और वे जो काम कर रहे होते हैं, वह पूरी तरह से अलग होता है। आजकल ऐसा बहुत देखने में आ रहा है कि डिग्री कुछ और होती है, और काम कुछ और... जैसे गायक पलाश सेन और मॉडल अदिति गोवित्रीकर... मूलतः दोनों डॉक्टर हैं, लेकिन दोनों ही बिलकुल अलग दुनिया में काम कर रहे हैं... लेकिन मूल में एक ही बात है... खुशी... काम करने की खुशी...। आखिर वे ऐसा क्यों कर रहे होते हैं। सीधी-सी बात है वे उस काम को अपनी पूरी ऊर्जा, लगन, शिद्दत और रुचि से कर रहे होते हैं।
आजकल हत्यारी प्रतिस्पर्धा के दौर में किसी परीक्षा में 97 प्रतिशत अंक पा लेना भी खुश होने के लिए नाकाफी है, क्योंकि यहाँ जोर सीखने पर नहीं बल्कि प्रतिस्पर्धा में सभी को पछाड़कर आगे आने पर है। इस सबमें पसंद का पढ़ना या सीखना तो पता नहीं कहाँ चला जाता है।
जरा रुककर ये भी सोचें कि आपके जीवन का अल्टीमेट लक्ष्य क्या है...? खुशी... ना! तो खुशी पाने के लिए आप क्या कर रहे हैं? मशीन न बनें... वो करें जिससे आप कुछ सीख पाएँ... जिसमें आप डूब पाएँगे। तो जानें कि अपनी रुचि के किसी भी काम से आप कैसे कुछ सीख सकते हैं।
1. पढ़ने को लेकर हमेशा भुक्कड़ रहो। यह आपके सोचने की लिमिट में इजाफा करेगा।
2. हार्ड वर्क करो। हार्ड वर्क से ज्यादा और कुछ भी कीमती अभी तक तो साबित नहीं हुआ है।
3. नया करने की कोशिश करो। ढर्रे पर चलना हमेशा आसान रहा है, मुश्किल काम करो और देखो कि कैसे खुशी आपके दरवाजे आ धमकती है। दृढ़ होना और रूढ़ होना दो अलग-अलग बातें हैं।
4. क्रिएटिव बने रहो। बच्चे नेचरली क्रिएटिव होते हैं, लेकिन जैसे-जैसे हम बड़े होते जाते हैं, हमारी क्रिएटिविटी खो जाती है।
5. ईमानदारी और खरेपन का ध्यान रखो।
6. हमेशा कंसिस्टेंट, लॉजिकल और प्रेक्टिकल विजन रखो।
हम सारे हरदम क्या होना चाहते हैं? खुश होना ही ना! बस...। तो उस काम को ढूँढो जो आपको खुश करे, नहीं तो आप खत्म हो जाओगे। लेकिन उसे पूरी गरिमा और सच्चाई से करो अन्यथा आप जीवन को खो दोगे।
Rajan Shrivastava
Lucknow (Uttar Pradesh)
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