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Wednesday, May 21, 2014

एटीट्यूड बदलो, सफलता होगी कदमों में

जिंदगी में सफलता के लिए सही एटीट्यूड होना इसलिए जरूरी है, क्योंकि इसके बिना आप चाहे कितने ही टेलेंटेड क्यों न हों, करियर में कामयाबी का वह शिखर नहीं छू सकते जिस शिखर तक आप सही नजरिया अपनाने के बाद पहुंच सकते हैं।


अब सवाल यह है कि सही एटीट्यूड किस तरह से अपनाया जाए? पहले तो अपनी किस्मत खुद बनाएं। अगर आप अपने करियर के दौरान यही सोचते रहेंगे कि कुछ अच्छा और दिलचस्प हो, तो आप इंतजार ही करते रह जाएंगे। इसलिए यही बेहतर है कि आगे बढ़ें और जिन चीजों के इंतजार में हैं उन्हें खुद कर डालें। अपने करियर के बारे में सकारात्मक नजरिया रखने से आप अपनी किस्मत को खुद दिशा देंगे।

नेपोलियन बोनापार्ट के शब्दकोष में असंभव नामक शब्द नहीं था। आप अपने करियर के संदर्भ में भी यह मान लें कि मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिए। ध्यान रहे कि अगर आप यह सोचेंगे कि आप नहीं कर सकते तो आप सचमुच ही नहीं कर पाएंगे, लेकिन अगर आप यह सोचते हैं कि आप यह कर सकते हैं तो फिर मंजिल दूर नहीं।

इसलिए हमेशा अपने आप से यह कहते रहें कि मैं कर सकता हूं। कोई काम छोटा नहीं होता है। हर काम की अपनी अहमियत और मूल्य होता है। न जाने कब कौन-सा काम किसी की नजर में चढ़ जाए और आपकी पहचान बन जाए, इसलिए जो काम कर रहे हैं उसे दिलचस्पी और गर्व के साथ करें। अगर आप आलस्य और लापरवाही दिखाएंगे तो आपके बारे में लोगों का यही नजरिया बन जाएगा और हो सकता है कि लोग आपके बारे में गलत राय कायम कर लें।

किसी काम को छोटा न समझें। ध्यान रखें कार्यस्थल पर हर व्यक्ति महत्वपूर्ण होता है। यह सही है कि अपने कार्य में व्यक्ति को आक्रामक नहीं होना चाहिए, लेकिन यह भी जरूरी है कि अपने इर्द-गिर्द के लोगों के साथ व्यवहार में हमेशा स्पष्ट होना चाहिए।

जगाएं अपने अंदर के हीरो को..


फटा पोस्टर निकला हीरो और हीरो ने दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए और अपने अलग गुणों के कारण वह भीड़ में अलग ही नजर आता है और दुनिया उसके पीछे घूमती है। फिल्मों में यह देखना सभी को अच्छा लगता है। हीरो अच्छा ही होना चाहिए उसमें सभी अच्छे ही गुण होना चाहिए और बुराई पर अच्छाई की विजय होना ही चाहिए। 

हम सभी फिल्मों को इसी मानसिकता के साथ देखते है। कभी इसका कारण जानना चाहा कि आखिर ऐसा क्यों होता है? क्योंकि हम सभी भीतर से ऐसे ही बने रहते हैं। हमें बुराई पसंद नहीं हम अच्छाई का साथ देने में विश्वास रखते हैं। हीरो की तरह ही हम तेज गति से आगे बढ़ना भी चाहते हैं पर क्या कारण है कि फिल्म देखने के पश्चात हम कहानी और हीरो की खूब तारीफ जरुर करते हैं पर इससे प्राप्त संदेश को आत्मसात नहीं कर पाते।

हम सभी के भीतर हीरो के गुण होते हैं और सभी चाहते हैं कि सच्चाई और ईमानदारी के रास्ते पर चलते हुए मेहनत करें और सफलता प्राप्त करें। अपने भीतर के हीरो को जागृत करने के लिए हम क्या करते हैं? क्या हम वाकई हीरो बनना चाहते हैं? जैसे कई प्रश्न मन में उमड़ना स्वाभाविक है। 

हीरो का मतलब यह नहीं कि हम भी फिल्मी हीरो की तरह अपनी बातें मनवाने के लिए मारधाड़ करने लगें। दरअसल हीरो एक प्रवृत्ति है जिसे समाज में अच्छी नजरों से देखा जाता है क्योंकि वह सत्य है वह असली है। करियर की डगर हो या फिर नौकरी की अगर हमनें सही समय पर अपने भीतर के हीरो को जागृत कर अपने गुणों को पहचान लिया तब सफलता प्राप्ति की दर ओर भी अच्छी हो सकती है।

हीरो के गुणों में सबसे महत्वपूर्ण है कि उसमें हिम्मत होती है। वह इसी हिम्मत के बल पर आगे बढ़ते जाता है और विपरीत परिस्थितियों का भी डटकर सामना करता है। कई व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनके समक्ष विपरीत परिस्थितियां जब आती है तब वे अपने सभी गुणों को एकत्रित कर किस प्रकार से सामना करें इस बात को लेकर विचार करते है। जबकि कुछ व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों के समक्ष नतमस्तक हो जाते हैं और जो भी होगा देखा जाएगा। अब क्या कर सकते है? जैसे प्रश्न स्वयं से भी पूछते है और असफलता को खुद ही ओढ़ लेते हैं। 

वे अपने गुणों के बारे में जानते ही नहीं और केवल थोड़ी सी विपरीत परितस्थतियों में स्वयं के बुरे की कल्पना करना आरंभ कर देते हैं। व्यक्ति अगर हीरो की तरह अपने गुणों की पहचान कर उन्हें और विकसित करने का प्रयत्न करता है तब वह समय के अनुरुप अपने आप में बदलाव कर पाता है और परिस्थितियों से सामना भी कर पाता है। इस कार्य के लिए लगातार आत्मविश्लेषण करने की जरुरत होती है अपने आप को नकारात्मक और सकारात्मक दोनों पहलुओं से देखना पड़ता है जिसके बाद हम यह समझ पाते है कि आखिर हमारे श्रेष्ठ गुण कौन से हैं। 

दोस्तों अगर हम अपने भीतर के हीरो को सामान्य परिस्थितियों में भी जागृत रखें तब विपरीत परिस्थितियों का हम हीरो की तरह सामना कर सकते हैं।

तभी बने काम, जब गणपति करे आराम...


किसी भी मांगलिक कार्य के पहले किस देवता का सर्वप्रथम पूजन हो, इसे लेकर देवताओं में गहरा मतभेद चल रहा था। कोई हल न सूझने पर वे प्रजापिता ब्रह्मा के पास पहुँचे। उनकी समस्या सुनकर ब्रह्माजी ने निर्णय दिया कि जो सारी पृथ्वी की परिक्रमा कर सबसे पहले उनके पास पहुँचेगा, वही प्रथम पूज्य का सम्मान पाएगा। इसके लिए सभी तैयार हो गए। 

नियत समय पर दौड़ शुरू हुई। सभी अपने-अपने वाहनों को तेजी से दौड़ाने लगे, ताकि पहला स्थान पा सकें, लेकिन गणेश अपनी जगह पर ही खड़े थे। उनके साथ बड़ी दिक्कत थी। एक तो उनका भारी-भरकमशरीर और छोटे-छोटे पैर। ऊपर से उनका वाहन चूहा। वह बेचारा कितना जोर लगाता? अपनी कमजोरियों के मद्देनजर वे जीतने का कोई दूसरा उपाय सोच रहे थे। 

अचानक वे कूदकर चूहे पर बैठे और कैलाश पर्वत पहुँचे। वहाँ उन्होंने शिव-पार्वती को एकसाथ बिठाकर उनकी सात बार परिक्रमा लगाई और सीधे ब्रह्मा के पास पहुँच गए। जब बाकी देवता वहाँ पहुँचे तो गणेश को देखकर उन्हें हैरानी हुई, तभी ब्रह्मा ने घोषणा की कि गणेश विजेता हैं। आज से सबसे पहले पूजा इनकी ही होगी। इस पर एक देवता बोला- गणेश कैसे जीत सकता है? 
  किसी भी मांगलिक कार्य के पहले किस देवता का सर्वप्रथम पूजन हो, इसे लेकर देवताओं में गहरा मतभेद चल रहा था। कोई हल न सूझने पर वे प्रजापिता ब्रह्मा के पास पहुँचे।      


इसने तो पृथ्वी की परिक्रमा की ही नहीं है। ब्रह्मा- गणेश ने पृथ्वी की ही नहीं, बल्कि समस्त ब्रह्मांड की सात बार परिक्रमा की है। ये पृथ्वी स्वरूपा माता और ब्रह्मांड के स्वरूप पिता का चक्कर लगाकर आए हैं। ब्रह्मा की बात सुनकर सभी देवताओं ने गणेश को प्रथम पूज्य मान लिया। 

दोस्तो, बुद्धि कौशल से व्यक्ति क्या नहीं पा सकता? फिर गणेशजी तो स्वयं बुद्धि के देवता हैं। वे तो इसका इस्तेमाल करेंगे ही। उन्होंने किया भी और इसी के बल पर वे प्रथम पूज्य बने। इसी तरह आप भी बुद्धि के बल पर सभी को पीछे छोड़ते हुए आगे निकल सकते हैं। वैसे गणेशजी का व्यक्तित्व गुणों की खान है। यदि आपने इन्हें जान-समझकर अपने अंदर उतार लिया तो फिर सफलता की दौड़ में आप भी कभी पीछे नहीं रहेंगे। उनकी तरह हर व्यक्ति को बड़े सिर का होना चाहिए।


पहला कदम तो बढ़ाएं



जिंदगी के सफर में हमें अपने आप को बनाए रखने के लिए काफी मेहनत करना पड़ती है। अच्छा इंसान बनने से लेकर नौकरी पाना और नाम कमाने के लिए निश्चित रूप से मेहनत का दूसरा कोई विकल्प नहीं होता। परंतु क्या सभी लोग सफलता प्राप्त कर लेते हैं या जो मनचाही सफलता होती है उसे प्राप्त कर लेते हैं या उसके करीब भी पहुंच पाते हैं। 

हम अगर परिस्थितियों को समझें तब तक समय गुजर चुका होता है और कई वर्षों बाद हमें लगता है कि अगर आज वहीं परिस्थितियां हमारे सामने होती तब हम और भी अच्छा कर सकते थे। दरअसल मेहनत, समर्पण और समय दोनों की माँग करती है और बहुत ज्यादा मेहनत करना पड़ेगी। इस बात को सोच कर व्यक्ति पहला कदम ही नहीं उठाता और पीछे हट जाता है। 

पीछे हटने की आदत कई लोगों में रहती है और कई लोग किसी भी तरह की स्पर्धा से ही डरते हैं। वे प्रतिभा संपन्न होने के बावजूद केवल इस बात को लेकर पीछे हट जाते हैं कि उनके जैसे और भी लोग हैं और शायद वे स्पर्धा में अच्छा न कर पाएं और असफलता मिलने पर लोग क्या कहेंगे? इस डर के कारण वे अक्सर पीछे रह जाते हैं और अपने लिए एक ऐसी जगह की तलाश में रहते हैं, जहां के वे ही राजा हों और बाकी सभी उनकी सुनने वाले हों। 


ऐसे व्यक्ति समान प्रतिभा या प्रतिभाशाली लोगों से मिलने से भी कतराते हैं और स्वयं को एक ऐसे घेरे में बांध लेते हैं जहां पर उनसे कोई स्पर्धा न कर सके। कई बार हमें लगता है कि मंजिल काफी दूर है और इसे पाने के लिए काफी लंबा सफर तय करना होगा। ऐसे में सफर को कई टुकड़ों में बांट लेना काफी लाभदायक सिद्ध हो सकता है। आप जानते हैं कि मंजिल दूर है पर इसका मतलब यह तो नहीं की मंजिल की ओर कदम ही न बढ़ाया जाए। 

मंजिल दूर है, इस कारण प्रयत्न न करना पीछे हटने वाली बात है। छोटे व सधे हुए कदमों से अपनी मंजिल की ओर कदम बढ़ाएंगे तब सफलता निश्चित है। यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि सबसे पहले हमें अपनी मंजिल का पता होना चाहिए। हमें पता होना चाहिए हमारी मंजिल कहां है और फिर बात आती है वहाँ तक पहुंचने की। आज के युवा साथी अपने करियर की मंजिल को लेकर काफी सजग रहते हैं और उन्हें पता रहता है कि वे क्या करना चाहते हैं। 

आज करियर के कई विकल्प भी मौजूद हैं और युवा साथी अपनी मंजिल की तलाश में निकल भी पड़ते हैं पर कई साथी ऐसे भी होते हैं जो मंजिल की ओर उत्साह भरे कदम बढ़ाते जरूर हैं पर बीच में ही सफर समाप्त कर देते हैं और एक नई मंजिल की ओर कदम बढ़ाने लगते हैं। इस कारण उन्हें लगातार असफलता प्राप्त होती रहती है। वे ये नहीं सोच पाते की उनके लिए श्रेष्ठ मंजिल कौन सी है। 

इस कारण जब भी अपनी मंजिल की ओर सधे कदम बढ़ाना हो तब मार्गदर्शन लेने में कोई भी बुराई नहीं बल्कि इससे यह पता चल जाता है कि आखिर उनके लिए क्या श्रेष्ठ है।